बिहार : बक्सर ज़िले के नवानगर औद्योगिक परिसर में स्थित भारत प्लस एथनॉल प्राइवेट लिमिटेड आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। इस एथनॉल प्लांट की नींव 9 अगस्त 2022 को रखी गई थी और 15 मार्च 2024 को इसका उद्घाटन कर उत्पादन शुरू हुआ था। प्लांट के संस्थापक एवं सीएमडी अजय सिंह, ग्राम बखोरापुर (भोजपुर) निवासी हैं। यह वही प्लांट है जिसे बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान स्थानीय रोजगार और पलायन रोकने के मॉडल के रूप में दिखाया गया था। एक युवक जो पहले दिल्ली में काम करता था, आज बक्सर के एथनॉल प्लांट में कार्यरत है। यह प्रचार नहीं, बल्कि सच्चाई थी।

700 से अधिक लोगों को मिला रोजगार

प्लांट शुरू होने के बाद करीब 700 से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार मिला। स्थानीय अर्थव्यवस्था में नई जान आई और किसानों को भी अपने उत्पाद का बेहतर मूल्य मिलने लगा।

उत्पादन और सप्लाई का रिकॉर्ड

भारत प्लस एथनॉल प्लांट की सालाना उत्पादन क्षमता लगभग 3.65 करोड़ लीटर है। कंपनी ने मई 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच मात्र 545 दिनों में 5.5 करोड़ लीटर एथनॉल की सफलतापूर्वक सप्लाई तेल विपणन कंपनियों को की।

45% ऑर्डर से प्लांट बंद होने के कगार पर

लेकिन 1 नवंबर 2025 से 30 अक्टूबर 2026 के लिए भारत प्लस एथनॉल को केवल 1.62 करोड़ लीटर का ही ऑर्डर मिला है, जो कुल क्षमता का सिर्फ 45% है।

इसी कारण प्लांट को 24 दिसंबर 2025 से बंद करना पड़ा। हालांकि सैकड़ों परिवारों की रोज़ी-रोटी को देखते हुए सीएमडी अजय सिंह ने मानवीय निर्णय लेते हुए प्लांट को 50% क्षमता पर दोबारा चलाने का फैसला किया, जिससे कंपनी को सालाना लगभग 6 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा।

किसान पर सीधा असर: मक्का और टूटे चावल के दाम गिरे

एथनॉल सप्लाई में कटौती का असर सिर्फ उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा और गंभीर प्रभाव बिहार के किसानों पर पड़ रहा है। पहले बिहार में मक्का उत्पादन लगभग 30 लाख मैट्रिक टन था। एथनॉल नीति लागू होने के बाद मक्का की कीमत 12 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 27 रुपये प्रति किलो तक पहुंची। इससे मक्का किसानों की आमदनी बढ़ी और उनकी आर्थिक स्थिति में स्पष्ट सुधार देखने को मिला। लेकिन अब स्थिति फिर पलट गई है। आज बिहार में मक्का का उत्पादन बढ़कर 60 लाख मैट्रिक टन हो गया है, जबकि एथनॉल प्लांटों को कम सप्लाई ऑर्डर मिलने के कारण मक्का का भाव गिरकर फिर 15 रुपये प्रति किलो तक आ गया है। इसी तरह टूटे चावल (ब्रोकन राइस) का भाव जो एथनॉल उद्योग के कारण 26 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया था, वह अब घटकर 20 रुपये प्रति किलो रह गया है।

किसान, उद्योग और सरकार तीनों का नुकसान

स्पष्ट है कि एथनॉल सप्लाई में कटौती से केवल प्लांट मालिक ही नहीं, बल्कि बिहार के लाखों किसान भाई भी भारी नुकसान झेल रहे हैं। मक्का और धान की बढ़ी हुई पैदावार के बावजूद किसानों को लागत के अनुरूप मूल्य नहीं मिल पा रहा है।

पूरे बिहार के एथनॉल प्लांट संकट में

बिहार में इस समय 12 ग्रेन आधारित एथनॉल प्लांट कार्यरत हैं, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता करीब 83 करोड़ लीटर है। लेकिन वर्तमान में पूरे राज्य को मात्र 39 करोड़ लीटर एथनॉल सप्लाई का ही ऑर्डर मिला है। सभी प्लांटों को औसतन 45–50% ऑर्डर ही प्राप्त हुआ है।

नीति सुधार की मांग

उद्योग और किसान दोनों का कहना है कि यदि एथनॉल सप्लाई ऑर्डर में जल्द सुधार नहीं किया गया, तो एथनॉल प्लांट बंद होंगे, हजारों नौकरियां जाएंगी, किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिलेगा और सरकार के 20% एथनॉल ब्लेंडिंग व ग्रीन फ्यूल मिशन पर भी गंभीर असर पड़ेगा।

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