मुजफ्फरपुर।दीपक कुमार तिवारी।
भारतीय संस्कृति पर्वों और त्योहारों की समृद्ध परंपरा के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहां प्रत्येक पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसके पीछे गहरी वैज्ञानिक समझ, सामाजिक चेतना और प्रकृति के साथ संतुलन की भावना निहित रहती है। इन्हीं पर्वों में मकर संक्रांति का विशेष स्थान है। यह ऐसा महापर्व है जो सूर्य, ऋतु परिवर्तन, कृषि, दान-पुण्य और सामाजिक समरसता को एक सूत्र में पिरोता है। मकर संक्रांति केवल एक तिथि या उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन का जीवंत प्रतीक है।
मकर संक्रांति का अर्थ और नामकरण
मकर शब्द संस्कृत से लिया गया है, जो एक राशि का नाम है और ‘संक्रांति’ का अर्थ है एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश। जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, उसी क्षण को मकर संक्रांति कहा जाता है। यह घटना सामान्यतः हर वर्ष 14 जनवरी को घटित होती है, जबकि कुछ वर्षों में यह 15 जनवरी को भी पड़ती है। भारत में मनाए जाने वाले अधिकांश त्योहार चंद्र पंचांग पर आधारित होते हैं, लेकिन मकर संक्रांति एक ऐसा पर्व है जो सौर पंचांग के अनुसार मनाया जाता है। यही कारण है कि इसकी तिथि लगभग स्थिर रहती है और यह खगोलीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि
मकर संक्रांति का उल्लेख प्राचीन वैदिक ग्रंथों, पुराणों और महाकाव्यों में मिलता है। वैदिक काल में सूर्य को देवता के रूप में पूजा जाता था, क्योंकि सूर्य ही पृथ्वी पर जीवन का आधार है। ऋग्वेद में सूर्य को ऊर्जा, प्रकाश और ज्ञान का स्रोत माना गया है। महाभारत काल में इस पर्व का विशेष महत्व देखने को मिलता है। भीष्म पितामह, जिन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था, उन्होंने शरशैया पर पड़े-पड़े उत्तरायण काल की प्रतीक्षा की और मकर संक्रांति के दिन ही देह त्याग किया। इस कारण यह दिन मोक्ष और आत्मिक उन्नति से भी जुड़ गया। माना जाता है कि उत्तरायण काल में देह त्याग करने से आत्मा को परम गति प्राप्त होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनि से मिलने जाते हैं, जो मकर राशि के स्वामी माने जाते हैं। यह कथा पिता-पुत्र के संबंधों में सामंजस्य और प्रेम का प्रतीक मानी जाती है।
खगोलीय और वैज्ञानिक महत्व

मकर संक्रांति का आधार पूर्णतः खगोल विज्ञान पर आधारित है। इस दिन सूर्य की गति उत्तर दिशा की ओर हो जाती है, जिसे उत्तरायण कहा जाता है। इसके साथ ही दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी होने लगती हैं। यह परिवर्तन पृथ्वी के झुकाव और सूर्य की परिक्रमा से संबंधित है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो यह समय स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी माना गया है। ठंड के प्रभाव से शरीर में जकड़न और आलस्य बढ़ जाता है, लेकिन उत्तरायण के साथ सूर्य की किरणें अधिक प्रभावी होने लगती हैं, जिससे शरीर में ऊर्जा का संचार होता है। यही कारण है कि इस पर्व पर सूर्य स्नान, नदी स्नान और सूर्य पूजा की परंपरा प्रचलित है।
कृषि और ग्रामीण जीवन में मकर संक्रांति
भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां के अधिकांश पर्व कृषि चक्र से जुड़े हुए हैं। मकर संक्रांति फसल कटाई के समय आती है। रबी की फसलें पकने लगती हैं और किसान अपने परिश्रम का फल पाकर आनंदित होते हैं। इस अवसर पर अन्न दान का विशेष महत्व है। किसान नई फसल से अन्न निकालकर देवताओं को अर्पित करते हैं और गरीबों में दान करते हैं। यह परंपरा प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को मजबूत करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस दिन मेलों, लोकगीतों और पारंपरिक खेलों का आयोजन किया जाता है, जिससे सामूहिक उल्लास का वातावरण बनता है।
भारत के विभिन्न हिस्सों में मकर संक्रांति
मकर संक्रांति भारत की सांस्कृतिक विविधता का सुंदर उदाहरण है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे विभिन्न नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
उत्तर भारत (बिहार, उत्तर प्रदेश) – यहां इसे ‘खिचड़ीपर्व’ कहा जाता है। गंगा और अन्य पवित्र नदियों में स्नान, खिचड़ी का भोग और दान-पुण्य प्रमुख परंपराएं हैं।
गुजरात और राजस्थान: यहां इसे ‘उत्तरायण’ के नाम से जाना जाता है। पतंगबाजी इस पर्व की पहचान है। आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है।
महाराष्ट्र: लोग एक-दूसरे को तिल-गुड़ देकर कहते हैं “तिळगुळ घ्या, गोडगोड बोला”, यानी तिल-गुड़ खाइए और मीठा बोलिए।
तमिलनाडु: इसे ‘पोंगल’ के रूप में चार दिनों तक मनाया जाता है। सूर्य, प्रकृति और पशुओं के प्रति आभार प्रकट किया जाता है।
पंजाब:लोहड़ी के रूप में यह पर्व आग, गीत और नृत्य के साथ मनाया जाता है।
असम: यहां ‘माघबिहू’ के नाम से यह त्योहार फसल उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
तिल, गुड़ और पतंग का प्रतीकात्मक अर्थ
मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का विशेष महत्व है। तिल को शुद्धता और गुड़ को मिठास का प्रतीक माना जाता है। इनका सेवन शरीर को गर्मी प्रदान करता है, जो सर्दियों में स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। पतंगबाजी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप का माध्यम भी है। यह पर्व बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों को एक साथ जोड़ता है और सामूहिक आनंद का अनुभव कराता है।
वही इस दिन गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा और अन्य पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है। माना जाता है कि मकर संक्रांति पर किया गया स्नान और दान पुण्यफल को कई गुना बढ़ा देता है। सूर्य पूजा, मंत्र जाप और हवन से वातावरण शुद्ध होता है और मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह पर्व आत्मशुद्धि और नई शुरुआत का प्रतीक भी है।
सामाजिक और नैतिक संदेश
मकर संक्रांति हमें परस्पर प्रेम, सौहार्द और समानता का संदेश देती है। यह पर्व सिखाता है कि जैसे सूर्य अंधकार को दूर कर प्रकाश फैलाता है, वैसे ही हमें भी अपने जीवन से नकारात्मकता हटाकर सकारात्मकता अपनानी चाहिए। दान-पुण्य की परंपरा समाज के कमजोर वर्गों के प्रति हमारी जिम्मेदारी का स्मरण कराती है। यह पर्व व्यक्ति को आत्मकेंद्रित जीवन से निकालकर समाजोन्मुखी बनने की प्रेरणा देता है। मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है, जिसमें विज्ञान, आस्था, प्रकृति और समाज चारों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यह पर्व केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, सकारात्मक और समरस बनाने की सीख देता है। सदियों से मनाया जा रहा यह महापर्व आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि यह हमें प्रकृति के साथ तालमेल, श्रम के सम्मान और आपसी भाईचारे का महत्व सिखाता है। मकर संक्रांति वास्तव में भारतीय सभ्यता की आत्मा को प्रतिबिंबित करने वाला पर्व है, जो हर वर्ष सूर्य के साथ-साथ हमारे जीवन में भी नए प्रकाश का संचार करता है।
